संत नहीं बन सकते तो संतोषी बन जाओ :आचार्य पं.उमापतिदास 

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

संत नहीं बन सकते तो संतोषी बन जाओ :आचार्य पं. उमापतिदास 

श्रीमद् भागवत कथा में सातवें दिन सुनाया गया श्रीकृष्ण व सुदामा चरित्र

बाबा बूढ़ेश्वरनाथ धाम में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में उमड़ रही है श्रद्धालुओं की भीड़ 

 

सांगीपुर, प्रतापगढ़।

बाबा बूढ़ेश्वरनाथ धाम में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा में कथाव्यास आचार्य पं. उमापतिदास महाराज ने बताया कि मनुष्य स्वयं को भगवान बनाने के बजाय प्रभु का दास बनने का प्रयास करें, क्योंकि भक्ति भाव देख कर जब प्रभु में वात्सल्य जागता है तो वे सब कुछ छोड़ कर अपने भक्तरूपी संतान के पास दौड़े चले आते हैं। गृहस्थ जीवन में मनुष्य तनाव में जीता है, जबकि संत सद्भाव में जीता है। यदि संत नहीं बन सकते तो संतोषी बन जाओ। संतोष सबसे बड़ा धन है। श्रीमदभागवत कथा के सातवें दिन सुदामा चरित्र के वर्णन के साथ कथाव्यास आचार्य पं. उमापतिदास महाराज द्वारा सुदामा चरित्र का वर्णन किए जाने पर पंडाल में उपस्थित श्रोता भाव-विभोर हो गए। महाराज जी ने कहा कि मित्रता करो तो भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा जैसी करो। वहीं महाराज जी ने सुदामा चरित्र प्रसंगों का सुंदर वर्णन किया। सुदामा जी जितेंद्रिय एवं भगवान श्री कृष्ण के परम मित्र थे। सुदामा भिक्षा मांगकर अपने परिवार का पालन पोषण करते थे। गरीबी होने के बावजूद भी हमेशा भगवान के ध्यान में मग्न रहते। पत्नी सुशीला सुदामा जी से बार-बार आग्रह करती कि आपके मित्र तो द्वारकाधीश हैं उनसे जाकर मिलो शायद वह हमारी मदद कर दें। सुदामा पत्नी के कहने पर द्वारका पहुंचते हैं और जब द्वारपाल भगवान श्रीकृष्ण को बताते हैं कि सुदामा नाम का ब्राह्मण आया है तो भगवान श्री कृष्ण यह सुनकर नंगे पैर दौड़कर आते हैं और अपने मित्र को गले से लगा लेते हैं। चल रही श्रीमद् भागवत कथा के पंडाल में सुदामा जी की दीन दशा देखकर लोग भाव विभोर हो गए। वहीं महाराज जी ने कुछ भजन गाए और आरती हुई जिसपर श्रृद्धालु जमकर नाचें। इस दौरान संगम पाण्डेय, रामकृष्ण मिश्र ‘नन्हे’ नगरहा, विपिन तिवारी, एडवोकेट अतुल मिश्र, शिक्षक सुधीर तिवारी, अवनीश मिश्र, सुभाष पांडेय समेत सैकड़ों भक्त मौजूद रहें।

Vikas Varta
Author: Vikas Varta

Leave a Comment

और पढ़ें