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गायत्री शक्तिपीठ पर सामूहिक श्राद्ध-तर्पण सम्पन्न

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गायत्री शक्तिपीठ पर सामूहिक श्राद्ध-तर्पण सम्पन्न

अमेठी।

बुधवार की सुबह पितृ अमावस्या के अवसर पर सामूहिक श्राद्ध-तर्पण का आयोजन गायत्री शक्तिपीठ अमेठी पर सम्पन्न हुआ। बड़ी संख्या में लोगों ने अपने पितरों को याद किया व श्रद्धा भाव के साथ पिंडदान व तर्पण किया। परिव्राजक आचार्य इंद्रदेव ने विधि-विधान के साथ श्राद्ध-तर्पण का कार्यक्रम सम्पन्न कराया।

गायत्री परिवार द्वारा पितृ पक्ष में प्रतिदिन तर्पण का कार्यक्रम कराया गया एवं पितृ विसर्जन के दिन तर्पण, पिण्डदान, हवन पूजन के साथ श्राद्ध कर्म संपन्न कर पितरों को विदाई दी गई। आचार्य इंद्रदेव ने कर्मकांड की महत्ता पर सभी को संबोधित करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में यह तथ्य घोषित किया गया है कि मृत्यु के साथ जीवन समाप्त नहीं होता। अनंत जीवन श्रृंखला की एक कड़ी मृत्यु भी है। इसलिये संस्कारों के क्रम में जीव की उस स्थिति को भी बाँधा गया है। पितरों के निमित्त पितृ पक्ष में जो कर्म कांड किये जाते हैं उनका लाभ जीवात्मा को कर्म कांड करने वाले की श्रद्धा के माध्यम से प्राप्त होता है। इसलिए इन क्रियाओं को श्राद्धकर्म भी कहा जाता है। अपने पितरों की तृप्ति के लिए प्रत्येक मनुष्य को पितृ पक्ष में श्रद्धा भाव के साथ तर्पण एवं श्राद्धकर्म अवश्य करना चाहिए। उन्होंने इस अवसर पर कर्म कांड में सम्मिलित सभी महानुभावों को अपने पितरों के नाम से पुण्य कार्य करने का संकल्प दिलाया। उन्होंने सभी को अपने पितरों की स्मृति में वृक्ष लगाने हेतु प्रेरित किया। श्राद्ध कर्म के पश्चात पांच कुंडों पर हवन का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।

अंत में गायत्री शक्तिपीठ के परिव्राजक इंद्रदेव शर्मा ने सभी का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि सामूहिक श्राद्ध तर्पण का कार्यक्रम प्रति वर्ष पितृ पक्ष में आयोजित किया जाता रहेगा। हमारी संस्कृति इतनी समृद्ध है कि इन्हीं कर्मकांडों के माध्यम से हम समस्त जीव-जंतु, पेड़-पौधे और अतृप्त आत्माओं के निमित्त कर्म-कांड करते हैं। आज आवश्यकता है कि घर-घर में भारतीय संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों की पुनर्स्थापना हो। गायत्री परिवार निरंतर साधनात्मक, रचनात्मक एवं सृजनात्मक अभियानों के माध्यम से पूज्य गुरुदेव के मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण की परिकल्पना को साकार करने की दिशा में प्रगतिशील है।

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