…तो क्या ऐसे लापरवाह चिकित्सकों के भरोसे होगा मरीजों का उपचार
नई दिल्ली।

डॉक्टर, जिसे ईश्वर का दूसरा रूप का कहा जाता है और मरीज़ की आधी समस्या तो डॉक्टर के मधुर व्यवहार से ही दूर हो जाती है। देश की राजधानी दिल्ली में अनेक गम्भीर बीमारियों के उपचार हेतु देश के बड़े बड़े चिकित्सा संस्थान स्थित हैं जहां देश के कोने कोने से मरीज़ पुनः स्वस्थ होने की आस में चिकित्सकों पर पूर्ण विश्वास कर अपने उपचार हेतु यहां स्थित विभिन्न चिकित्सा संस्थानों में आते हैं, किन्तु यदि इन प्रतिष्ठित संस्थानों में चिकित्सक ही मरीजों मनोबल बढ़ाने के बजाय गिराने का कार्य करें तो ऐसे चिकित्सीय संस्थानों से मरीज़ का उचित उपचार कदाचित असंभव ही कहा जा सकता है। देश की राजधानी में दिलशाद गार्डन स्थित एक प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान (इहबास) में आए दिन चिकित्सकों द्वारा ऐसी ही कार्यशैली देखने को मिलती है।

ज्ञात हो कि गुरुवार को उक्त संस्थान के न्यूरोलॉजी विभाग में उपचार हेतु आए एक मरीज जो स्वास्थ्य कारणों से विगत कई दिनों से बोल पाने में असमर्थ ने कक्ष संख्या 21 तैनात डॉ आदित्य प्रताप सिंह को जब अपनी समस्याओं को अपने मोबाइल में लिखकर एवं वीडियो के माध्यम से अवगत कराया तो डॉ आदित्य प्रताप सिंह ने पहले तो उपचार की कड़ी में मरीज़ से बुलवाने का प्रयास किया किन्तु उक्त प्रयासों से कोई हल न निकला और मरीज़ को समस्या होने लगी तो डॉ आदित्य प्रताप सिंह ने मरीज़ को मनोरोग विभाग में भेजते हुए रूखे अंदाज में कहा कि बोलो, तुम भी परेशान हो हमको भी परेशान किए हो और फैमिली वालों को भी, जाओ वहां दिखाओ वैसे भी होना कुछ नही है।
डॉ आदित्य प्रताप सिंह द्वारा कहे गए उक्त शब्द किस उपचार का हिस्सा है यह तो फिलहाल वह ही जानें किन्तु उनका यह व्यवहार मरीजों को हतोत्साहित अवश्य करता है और उनकी योग्यता एवं संस्थान की कार्यशैली व मर्यादा पर बड़ा प्रश्नचिह्न है। इस संबंध में संस्थान के निदेशक डॉ राजिंदर के धमीजा से संपर्क करने का प्रयास किया गया किन्तु उनसे संपर्क नही हो पाया।









