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लोकतंत्र या कुलीनतंत्र? भारतीय राजनीति में परिवारवाद का बोलबाला, सरपंच से संसद तक फैला जाल

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लोकतंत्र या कुलीनतंत्र? भारतीय राजनीति में परिवारवाद का बोलबाला

सरपंच से संसद तक फैला जाल

 

भारतीय लोकतंत्र में परिवारवाद की जड़ें गहरी हो चली हैं, जो ग्राम पंचायतों से लेकर संसद तक फैल चुकी हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 5,204 सांसदों और विधायकों में 1,107 (21 प्रतिशत) की राजनीतिक पृष्ठभूमि परिवारों से जुड़ी है। हर पांच में से एक जनप्रतिनिधि ‘वंशवाद’ की सीढ़ी पर सवार है। लोकसभा में यह आंकड़ा 31 प्रतिशत तक पहुंचता है, जबकि विधानसभाओं में 20 प्रतिशत है। महिलाओं में यह अनुपात 47 प्रतिशत है, जो सशक्तिकरण कम, परिवारों का विस्तार ज्यादा दर्शाता है। राजनीतिक दलों का दावा है कि वे संगठन में परिवारवाद पर लगाम लगाएंगे, लेकिन 2024 के चुनावों में भाजपा ने 18 प्रतिशत और कांग्रेस ने 32 प्रतिशत ‘वंशवादी’ उम्मीदवार उतारे। यह प्रवृत्ति न केवल संसद-विधानसभा तक सीमित है, बल्कि नगर निगमों और पंचायतों तक पहुंच चुकी है।

1. मध्य प्रदेश: विरासत की सियासत

मध्य प्रदेश में परिवारवाद छठे स्थान पर है, जहां 230 विधायकों में 48 (21 प्रतिशत) परिवारों की राजनीतिक विरासत संभाल रहे हैं जिनमें भाजपा के 28 और कांग्रेस के 20। लोकसभा-राज्यसभा के 29 सांसदों में पांच महिलाएं वंशवाद को आगे बढ़ा रही हैं। गुना-शिवपुरी से केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की विरासत माधवराव और विजयाराजे सिंधिया से जुड़ी है। राज्यसभा के दिग्विजय सिंह के बेटे जयवर्धन विधायक हैं, तो भाई लक्ष्मण सिंह संसद-विधानसभा में रहे। भाजपा की कृष्णा गौर (गोविंदपुरा) पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर की बहू हैं, जबकि सुरेंद्र पटवा चाचा सुंदरलाल पटवा की विरासत संभाल रहे हैं। कांग्रेस में जयवर्धन सिंह (राघोगढ़) तीसरी पीढ़ी के नेता हैं, और अजय सिंह (चुरहट) अर्जुन सिंह के बेटे। यह सियासत ‘परिवार क्लब’ बनती जा रही है।

2. उत्तर प्रदेश: यादव और बहुगुणा का दबदबा

उत्तर प्रदेश में परिवारवाद की स्थिति गंभीर है, जहां 30 प्रतिशत से अधिक विधायक ‘वंशवादी’ हैं। समाजवादी पार्टी ने 2024 लोकसभा चुनाव में मुलायम सिंह यादव परिवार के पांच सदस्यों—अखिलेश (कन्नौज), डिंपल (मैनपुरी), धर्मेंद्र, अक्षय और आदित्य यादव को टिकट दिए। बहुगुणा परिवार भी पीछे नहीं: हेमवती नंदन बहुगुणा पूर्व मुख्यमंत्री थे, बेटे विजय बहुगुणा उत्तराखंड के सीएम बने और बेटी रीता बहुगुणा जोशी यूपी में मंत्री रहीं। स्थानीय स्तर पर लखनऊ और कानपुर के नगर निगमों में 40 प्रतिशत पार्षद वंशवादी पृष्ठभूमि से हैं। यह प्रवृत्ति जातिगत वोट बैंक को तो मजबूत करती है, लेकिन लोकतंत्र की जड़ें कमजोर।

3. महाराष्ट्र: सियासत और आर्थिक शक्ति का गठजोड़

महाराष्ट्र में परिवारवाद आर्थिक ताकत से जुड़ा है, जहां 25 प्रतिशत विधायक-सांसद परिवारों से आते हैं। 2024 विधानसभा चुनाव में 80 प्रतिशत से अधिक सीटों पर वंशवादी उम्मीदवार उतरे। शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले लोकसभा सांसद हैं, तो अजित पवार के भतीजे रोहित पवार विधायक। बारामती में भतीजा युगेंद्र पवार ने चाचा अजित को चुनौती दी। ठाकरे और फड़णवीस परिवार भी सत्ता के केंद्र बने हुए हैं। मुंबई महानगरपालिका में 35 प्रतिशत पार्षद पूर्व पार्षदों के रिश्तेदार हैं, जो विकास योजनाओं को प्रभावित करते हैं। यह सियासत धन और सत्ता का गठजोड़ बन चुकी है।

4. कर्नाटक-केरल: दक्षिण में वंशवाद की लहर

कर्नाटक में जेडी(एस) जैसे दलों में 66 प्रतिशत उम्मीदवार वंशवादी हैं। डीके शिवकुमार के भाई डीके सुरेश विधायक हैं, और 2023 विधानसभा में कांग्रेस ने 20 से अधिक वंशवादी टिकट दिए। बेंगलुरु ग्रामीण पंचायतों में 50 प्रतिशत सरपंच परिवारों के कब्जे में हैं। केरल में 22 प्रतिशत विधायक वंशवादी हैं। ओमान चांडी का परिवार और सीपीआई(एम) नेता पी विजयन के रिश्तेदार सियासत में सक्रिय हैं। त्रिवेंद्रम नगर निगम में 30 प्रतिशत पार्षद वंशवादी हैं। दक्षिण में महिलाओं का 47 प्रतिशत प्रतिनिधित्व वंशवाद का ही परिणाम है।

5. पंचायत से पार्षद तक: जमीनी स्तर पर कब्जा

परिवारवाद की जड़ें स्थानीय निकायों में गहरी हैं। जिला और ब्लॉक पंचायतों में 40-50 प्रतिशत पदाधिकारी परिवारों से हैं। नगर निगम चुनावों में 35 प्रतिशत विजेता वंशवादी पृष्ठभूमि से हैं। तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में ग्राम पंचायतों में पूर्व सरपंचों के बच्चों का दबदबा है, जहां विकास योजनाएं परिवार हितों पर केंद्रित रहती हैं। गुजरात में 12 प्रतिशत स्थानीय प्रतिनिधि वंशवादी हैं। पंचायत डेवोल्यूशन इंडेक्स 2024 के अनुसार, कर्नाटक शीर्ष पर है, लेकिन वंशवाद लोकतंत्र को खोखला कर रहा है।

6. लोकतंत्र पर सवाल: क्या है समाधान?

एडीआर की रिपोर्ट चेतावनी देती है कि वंशवाद लोकतंत्र को ‘कुलीनतंत्र’ में बदल रहा है। हार्वर्ड के सिद्धार्थ जॉर्ज का शोध बताता है कि यह प्रवृत्ति आर्थिक विकास को प्रभावित करती है, क्योंकि नीतियां परिवार हितों पर आधारित होती हैं। गेटवे हाउस के विश्लेषक मानते हैं कि यह महिलाओं को सियासत में लाने में मददगार रहा, लेकिन नए नेतृत्व की राह में रोड़ा भी। विशेषज्ञ सख्त कानून, पारदर्शी टिकट वितरण और युवा नेतृत्व को बढ़ावा देने की वकालत करते हैं।

क्या भारत का लोकतंत्र सभी के लिए होगा, या परिवारों का गढ़ बना रहेगा? यह सवाल हर नागरिक से जवाब मांगता है।

मध्य प्रदेश संवाददाता हरिशंकर पाराशर की कलम से…

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