
मजदूरों और किसानों की आवाज बुलंद करने हेतु किसान महासभा ने किया प्रदर्शन
राष्ट्रपति को संबोधित बारह सूत्रीय ज्ञापन जिलाधिकारी को सौंपा
रायबरेली।
मजदूरों और किसानों की आवाज बुलंद करने हेतु अखिल भारतीय किसान महासभा द्वारा राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन किया गया। जनपद मुख्यालय स्थित विकास भवन परिसर में अखिल भारतीय किसान महासभा प्रदर्शन किया गया तत्पश्चात जिलाधिकारी कार्यालय पहुंच कर राष्ट्रपति को संबोधित 12 सूत्रीय ज्ञापन जिलाधिकारी को सौंपा गया।
जिलाध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद श्रीवास्तव ने बताया कि किसानों के लंबे संघर्ष के बाद जब कृषि कानून वापस लिए गए थे, तब किसानों से किए गए वादे आज तक पूरे नहीं हुए हैं। लगातार चली आ रही एनडीए की इस तीसरी सरकार की नीतियों से भारत के मेहनतकश लोगों को गहरे संकट का सामना करना पड़ रहा है, इनका उद्देश्य कॉरपोरेट और अति अमीरों को समृद्ध करना है। जबकि खेती की लागत और मुद्रास्फीति हर साल 12-15% से अधिक बढ़ रही है, सरकार एमएसपी में केवल 2 से 7% की वृद्धि कर रही है। इसने सी2+50% फॉर्मूले को लागू किए बिना और खरीद की कोई गारंटी दिए बिना 2024-25 में धान के एमएसपी को केवल 5.35% बढ़ाकर 2300 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया। केंद्र सरकार पिछले साल खरीदी गई फसल को मंडियों से उठाने में विफल रही, जिससे इस साल मंडियों में जगह की कमी के कारण धान की खरीद ठप हो गई। किसान अपने आधे अधूरे एमएसपी, एपीएमसी मंडियों, एफसीआई और राशन प्रणाली आपूर्ति को बचाने के लिए फिर से सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मदद के लिए, केंद्रीय बजट 2024-25 में घोषित डिजिटल कृषि मिशन-डीएएम के माध्यम से सरकार भूमि और फसलों का डिजिटलीकरण लागू कर रही है। संविदा खेती (कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग) को बढ़ावा देने और खादद्यान्न फसलों की जगह वाणिज्य फसलों को उगने पर जोर दे फसल पद्धति को बदलने की योजनाएँ चल रही हैं, जो कॉर्पोरेट बाजार की आपूर्ति में सहायक हैं। बजट में घोषित राष्ट्रीय सहयोग नीति का उद्देश्य फसल कटाई के बाद के कार्यों को कॉर्पोरेट द्वारा अपने नियंत्रण में लेना और सहकारी क्षेत्र के कर्ज को कॉर्पोरेट की ओर मोड़ना है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ कई समझौते किए हैं। सार्वजनिक क्षेत्र में एफसीआई भंडारण, केंद्रीय भंडारण निगम और एपीएमसी मार्केट यार्ड सभी को अडानी और अंबानी जैसी कॉर्परिट कंपनियों को किराए पर दिया जा रहा है। खेती में लगातार घाटा बढ़ने से किसानों पर कर्ज बढ़ता जा रहा है और उनकी खेती से बेदखली बढ़ती जा रही है। केंद्र सरकार द्वारा लगाए जा रहे चार श्रम कोड न्यूनतम मजदूरी, सुरक्षित रोजगार, उचित कार्य समय और यूनियन बनाने के अधिकार की किसी भी गारंटी को खत्म करते हैं। निजीकरण, ठेकाप्रथा और भर्ती न करने की नीतियां मौजूदा मज़दूरों और नौकरी चाहने वाले युवाओं को वस्तुतः गुलामी की ओर धकेलती हैं। ट्रेड यूनियन बनाने के मौलिक अधिकार, पुरानी पेंशन योजना को पुनर्जीवित करने, सेवानिवृत्ति के अधिकार, खाद्य और स्वास्थ्य सुरक्षा, शिकायतों के निवारण के लिए प्रभावी कानूनी तंत्र आदि की रक्षा के लिए भी ट्रेड यूनियन संघर्ष पथ पर हैं। हमारा मानना है कि किसानों को गरीबी और कृषि संकट से मुक्ति दिलाने एवं मज़दूरों को उनके मांगो से हाजिल करने के लिए मजदूर-किसान एकता का निर्माण और इसे मजबूत करना राष्ट्रीय हित में अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है। रक्षा सहित सभी रणनीतिक उत्पादन और रेलवे, बिजली एवं अन्य परिवहन सहित बुनियादी, महत्वपूर्ण सेवाओं का निजीकरण देश की आत्मनिर्भरता को पूरी तरह से खतरे में डाल देगा और सरकार की आय को प्रभावित करेगा। सरकार ने पिछले तीन वर्षों में लगातार खाद्य सब्सिडी में 60,470 करोड़ रुपये की कटौती की है। विश्व व्यापार संगठन के निर्देशों के अनुसार कई राज्यों में नकद हस्तांतरण योजना के माध्यम से सार्वजनिक वितरण प्रणाली को ध्वस्त कर दिया गया है। नकद हस्तांतरण की राशि बहुत कम है, जबकि बाजार में खाद्यान्न बहुत महंगा है। मजदूरों और गरीब लोगों के लिए खाद्यान्न की कमी की समस्या बढ़ती जा रही है। सरकार आईसीडीएस, एमडीएम जैसी बुनियादी सेवा योजनाओं के लिए बजट आवंटन में कटौती कर रही है और उनका निजीकरण कर रही है।


औद्योगीकरण के नाम पर कृषि भूमि का जबरन अधिग्रहण किया जा रहा है, लेकिन वास्तव में यह भूमि अति-धनवानों के मनोरंजन, वाणिज्यिक उपयोग, पर्यटन, रियल एस्टेट आदि के लिए दी जा रही है, जबकि सरकार बेशर्मी से भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 और वन अधिकार अधिनियम को लागू करने से इनकार कर रही है। कॉर्पोरेट कंपनियां बिजली के स्मार्ट मीटर, मोबाइल नेटवर्क के उच्च रिचार्ज शुल्क, बढ़ते टोल शुल्क, रसोई गैस व डीजल एवं पेट्रोल की बढ़ती कीमतों और जीएसटी के विस्तार के माध्यम से मोटी कमाई कर रही हैं। इसके विपरीत, कामकाजी लोग किसान, औद्योगिक एवं खेत मज़दूर और मध्यम वर्ग कर्ज के बोझ से दबा जा रहा हैं। भूमिहीनों को जीवनयापन के लिए उच्च ब्याज दरों पर स्वयं सहायता समूहों से कर्जा लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है। ग्रामीण भारत में ठेका मजदूरों की मजदूरी बहुत कम है। सरकार द्वारा कॉरपोरेट घरानों का 16.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक का कर्जा माफ कर दिया है, जबकि किसानों और खेत मज़दूरों को ऋणग्रस्तता से मुक्त करने से इनकार कर दिया। सरकार द्वारा संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के साथ 9 दिसंबर 2021 के लिखित समझौते का उल्लंघन किया गया है। इस पृष्ठभूमि में 24 अगस्त 2023 को तालकटोरा स्टेडियम में पहली बार अखिल भारतीय स्तर पर हुए मजदूर-किसान अधिवेशन द्वारा मांग पत्र अपनाया था और निरंतर संघर्ष का आह्वान किया गया था। इसके बाद 2023 नवंबर में राज्यों की राजधानियों मे महापड़ाव, 16 फरवरी 2024 को औद्योगिक हड़ताल एवं ग्रामीण बंद और इसके बाद सरकार की मजदूर विरोधी, किसान-विरोधी नीतियों का पर्दाफाश करने और उनका विरोध करने के लिए अभियान हमारे लगातार किये गये विरोध के उदाहरण हैं, जिन्होंने सरकार का ध्यान आकर्षित किया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। इन मांगों पर बार- बार विरोध के बावजूद सरकार जवाब देने में विफल रही है। इसलिए 3 काले कृषि कानूनों के खिलाफ महा-संघर्ष की 4वीं वर्षगांठ पर एक बार फिर अपनी मांगों को उठाने के लिए देशभर के जिलों में 26 नवंबर को किसानों, ग्रामीण गरीब और औद्योगिक मज़दूरों की बड़े पैमाने पर लामबंदी का यह निर्णय लिया गया है। विरोध कार्रवाई 12 मुख्य मांगों और 24 अगस्त 2023 को तालकटोरा स्टेडियम नई दिल्ली में हुए पहले अखिल भारतीय मज़दूर किसानों महाधिवेशन द्वारा अपनाए गए मांग पत्र पर आधारित हैं।
Author: Vikas Srivastava










