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मध्य प्रदेश में राशन कालाबाजारी का काला सच: सरकारी गोदाम से उपभोक्ता तक भ्रष्टाचार, दांव पर बच्चों का भविष्य

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मध्य प्रदेश में राशन कालाबाजारी का काला सच: सरकारी गोदाम से उपभोक्ता तक भ्रष्टाचार, दांव पर बच्चों का भविष्य

 

हरिशंकर पाराशर

कटनी।

मध्य प्रदेश के कटनी जिले में कलेक्टर के सख्त निर्देश पर हुई छापेमारी ने राशन वितरण प्रणाली में गहरे भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया है। एक स्थानीय राशन दुकान पर 7.60 लाख रुपये मूल्य के खाद्यान्न की हेराफेरी का खुलासा हुआ, जिसके बाद विक्रेता के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी) और आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज की गई। यह घटना राज्य में फैले कालाबाजारी के विशाल नेटवर्क का मात्र एक हिस्सा है, जो सरकारी गोदामों से लेकर ट्रांसपोर्टर, गोदाम प्रबंधकों और विक्रेताओं तक फैला हुआ है। यह भ्रष्टाचार न केवल राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) की भावना को चोट पहुंचा रहा है, बल्कि मिड-डे मील योजना को भी प्रभावित कर रहा है, जहां राजनीतिक संरक्षण प्राप्त स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) बच्चों के पोषण पर कुठाराघात कर रहे हैं।

कटनी में खाद्य विभाग की स्पेशल टास्क फोर्स ने जांच के दौरान पाया कि सब्सिडी वाला गेहूं, चावल और अन्य अनाज खुले बाजार में ऊंचे दामों पर बेचा जा रहा था। कलेक्टर के आदेश पर शुरू हुई इस कार्यवाही में 7.60 लाख रुपये का सरकारी नुकसान सामने आया। जिला पुलिस अधीक्षक कटनी ने बताया कि जांच का दायरा बढ़ाया जा रहा है और अन्य राशन दुकानों पर भी नजर रखी जा रही है। यह कार्यवाही मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के उस आदेश का हिस्सा है, जिसमें उन्होंने कालाबाजारियों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) तक के इस्तेमाल की चेतावनी दी थी।

हालांकि, कटनी की यह घटना मध्य प्रदेश में राशन कालाबाजारी की व्यापक समस्या का एक छोटा-सा नमूना है। सूत्रों के मुताबिक, सरकारी खाद्यान्न आवंटन में ट्रांसपोर्टरों द्वारा अवैध ‘कट’ वसूली, गोदामों में ‘पीला’ (कमीशन) और विक्रेताओं द्वारा अनाज की खुर्दबुर्द एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा है। एक पूर्व वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “गोदाम से निकलते ही 10-15 प्रतिशत अनाज ‘गायब’ हो जाता है। यह सब ऊपरी स्तर के अधिकारियों और स्थानीय नेताओं के संरक्षण में होता है। ईमानदार अधिकारी कोशिश करते हैं, लेकिन अकेले कुछ नहीं कर पाते।” भोपाल, इंदौर और जबलपुर जैसे जिलों में भी मुख्यमंत्री उड़नदस्ता ने हाल के महीनों में इसी तरह की छापेमारी की है, लेकिन भ्रष्टाचार का यह जाल अब भी अटूट दिखता है।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जुलाई 2024 में एक वीडियो कॉन्फ्रेंस में खाद्य अधिकारियों को पुलिस के साथ मिलकर जांच तेज करने का निर्देश दिया था। उन्होंने कहा,”कालाबाजारी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। गरीबों का हक छीनने वालों पर सख्त से सख्त कार्यवाही होगी।” इसके बावजूद, एमपी राशन मित्र पोर्टल पर पात्रता पर्ची डाउनलोड करने वाले लाखों परिवारों को समय पर राशन नहीं मिल रहा। एक हालिया सर्वे के अनुसार, मध्य प्रदेश में 20 प्रतिशत से अधिक सब्सिडी वाला अनाज कालाबाजारी में बिक जाता है, जिससे सरकार को सालाना करोड़ों रुपये का नुकसान हो रहा है।

इस भ्रष्टाचार का सबसे गंभीर असर मिड-डे मील योजना पर पड़ रहा है। कटनी, बालाघाट और सिवनी जैसे जिलों में विद्यालयों में संचालित इस योजना में स्वयं सहायता समूहों को भोजन तैयार करने का ठेका दिया जाता है, लेकिन कई समूह राजनीतिक नेताओं के करीबी रिश्तेदारों या समर्थकों के हैं। एक एनजीओ की रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि इन समूहों द्वारा घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे बच्चों का स्वास्थ्य खतरे में है। रिपोर्ट में कहा गया, “ठेकेदार राशन को कालाबाजार में बेच देते हैं और स्कूलों में सस्ते विकल्पों का उपयोग करते हैं, जिससे बच्चों का पोषण प्रभावित हो रहा है।”

शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह ने हाल ही में कटनी में ‘संदीपनी विद्यालय’ का उद्घाटन किया, लेकिन मिड-डे मील की गुणवत्ता को लेकर स्थानीय स्तर पर असंतोष बढ़ रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर यह समस्या और भी गंभीर है। केंद्रीय खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, एनएफएसए के तहत 80 करोड़ लाभार्थियों के लिए आवंटित 30 प्रतिशत अनाज हेराफेरी का शिकार हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आधार-लिंक्ड वितरण, सीसीटीवी निगरानी और डिजिटल ट्रैकिंग जैसे उपाय इस समस्या को कम कर सकते हैं, लेकिन राजनीतिक दबाव के चलते इनका अमल धीमा है। विपक्षी नेता कमलनाथ ने विधानसभा में इस मुद्दे को उठाते हुए कहा,”सरकार की ईमानदारी केवल भाषणों तक सीमित है। गरीबों के हक के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है।”

मध्य प्रदेश सरकार ने दावा किया है कि कटनी जैसी कार्यवाहियां पूरे राज्य में जारी रहेंगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह भ्रष्टाचार का जाल पूरी तरह टूट पाएगा? विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक सख्त कानूनी कार्यवाही, पारदर्शी निगरानी और राजनीतिक इच्छाशक्ति का समन्वय नहीं होगा, तब तक गरीबों का हक छिनता रहेगा।

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