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न्यायालय के आदेश की आड़ में भ्रष्टाचार को संरक्षण देता लोक निर्माण विभाग

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न्यायालय के आदेश की आड़ में भ्रष्टाचार को संरक्षण देता लोक निर्माण विभाग

फर्जी अभिलेखों की पुष्टि होने के उपरांत भी कार्यवाही से कतरा रहा विभाग

रायबरेली।

लोक निर्माण विभाग खंड एक में लगभग तीन वर्षों से लंबित फर्जी अभिलेखों के आधार पर नौकरी के मामले में लोक निर्माण विभाग द्वारा अब तक कोई कार्यवाही न करके भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने का कार्य किया जा रहा है। शिकायतकर्ता द्वारा विभिन्न माध्यमों से शिकायत करने पर न्यायालय के एक आदेश का हवाला देकर निस्तारण की आख्या लगा दी जाती है। न्यायालय के आदेश अनुसार किसी भी मृतक कर्मचारी की पारिवारिक पेंशन को रोकना अपराध की श्रेणी में आता है किंतु अधिकारियों द्वारा इस आदेश से पूरे प्रकरण को जोड़कर शिकायतकर्ता के साथ उच्च अधिकारियों को भी गुमराह किया जा रहा है। न्यायालय के आदेश अनुसार मृतक सेवानिवृत कर्मचारियों की पारिवारिक पेंशन को रोकने का अधिकार नहीं है और न ही उनके उत्तराधिकारी पर कोई कार्यवाही की जा सकती है। उक्त आदेश में फर्जी अभिलेखों पर नौकरी करने के सम्बन्ध में कोई निर्देश नही दिया गया है। किंतु उक्त प्रकरण में मृतक सेवानिवृत कर्मचारी जिसने फर्जी अभिलेखों के आधार पर 13 वर्षों तक अधिक नौकरी की गई और उसकी मृत्यु के पश्चात उत्तराधिकारियों को पेंशन दी जा रही है जो उच्च न्यायालय के आदेश का दुरुपयोग है।

शिकायतकर्ता राजेंद्र बहादुर द्वारा बताया गया कि मेरे पिता स्व. अवधेश कुमार की वास्तविक जन्मतिथि 13 फरवरी 1949 है जिसके आधार पर उनकी सेवानिवृत्ति 13 फरवरी 2009 को हो जानी चाहिए किन्तु उनकी सेवा पुस्तिका में 27 जून 2009 को उत्तराधिकारियों का नामांकन किया गया है जिसमें हम दो भाईयों का नाम हटाकर छतरा देवी आदि का नाम लिखा गया। उन्होंने बताया कि 2009 में ही अभिलेखों में छेड़छाड़ कर उनके पिता की जन्मतिथि 1962 दिखाई गई और उसके आधार पर 1976 में मात्र 14 वर्ष की आयु में लोक निर्माण विभाग में उनकी नौकरी लग गई, जो स्वयं में संदेह उत्पन्न करता है। इसके अतिरिक्त उत्तराधिकारी के रूप में पेंशन प्राप्त कर रही छतरा देवी मेरी मां नही हैं।

उन्होंने कहा कि उक्त प्रकरण में अनेक साक्ष्य प्रस्तुत किए गए जिसमें फर्जी अभिलेखों के आधार पर नौकरी एवं फर्जी उत्तराधिकारियों द्वारा पेंशन लेने के साक्ष्य दिए गए हैं यहां तक कि पेंशन प्राप्त कर रही महिला उत्तरा देवी द्वारा न्यायालय में दिए गए लिखित बयान से भी उनके उत्तराधिकार का दावा संदेहास्पद है किंतु इसके उपरांत भी विभागीय अधिकारियों द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की गई और न ही पेंशन रोकी गई।

उक्त प्रकरण में जब हमारी टीम द्वारा तथ्यों को जानने का प्रयास किया गया तो यह स्पष्ट हुआ कि वर्तमान समय में जिस छतरा देवी के द्वारा स्व. अवधेश कुमार की पत्नी होने का दावा किया जा रहा है वह वास्तव में उनकी पत्नी नहीं है। किंतु विभाग बार-बार न्यायालय के आदेश का हवाला देकर मामले को निस्तारित करता रहा है। सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई सूचना में विभाग द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि उक्त मृतक कर्मचारी द्वारा जो अभिलेख लगाकर नौकरी की गई उनके फर्जी होने की पुष्टि होती है। अब ऐसे में सवाल यह होता है कि जब फर्जी अभिलेखों के आधार पर नौकरी की गई तो उक्त कर्मचारी के उत्तराधिकारियों को किस आधार पर पेंशन जारी की जा रही है, क्या फर्जी अभिलेखों के आधार पर नौकरी करके वेतन व पेंशन लेना अपराध नही है? क्या जिम्मेदारों द्वारा ऐसे भ्रष्टाचार को संरक्षण देना अपराध नही है?

कार्यालय से गायब मिलीं अधिशाषी अभियंता

उक्त प्रकरण के संबंध में जानकारी हेतु जब संवाददाता द्वारा लोक निर्माण विभाग खंड एक की अधिशाषी अभियंता संजू कुमारी के भेंट करने हेतु कार्यालय पहुंची तो पूर्व की भांति इस बार भी वह कार्यालय में अनुपस्थित पाई गईं। हालांकि वह समय जनता से मिलने हेतु निर्धारित है और कक्ष के बाहर सूचना भी चस्पा की गई है कि जनता से मिलने का समय 10 से 12 तक। किन्तु पूर्वाह्न 11:43 तक अधिशाषी अभियंता संजू कुमारी कार्यालय नही पहुंची थीं। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि जब कार्यालय आना ही नही है तो सूचना चस्पा करने एवं शासनादेशों का क्या औचित्य है?

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