
जीएसटी: आठ साल बाद भी राहत अधूरी
नीतियों की जीत और जनता की मजबूरी

नई दिल्ली।
माल एवं सेवा कर (जीएसटी) ने भारत में आठ साल पूरे कर लिए हैं। 2017 में ‘एक राष्ट्र, एक कर’ के नारे के साथ शुरू हुई यह व्यवस्था आज ‘जीएसटी 2.0’ के नए अवतार में सामने आई है। 56वीं जीएसटी परिषद की 3 सितंबर की बैठक में लिए गए फैसले के तहत आज से 12% और 28% टैक्स स्लैब खत्म कर 5% और 18% की सरल संरचना लागू की गई है। लग्जरी और सिन गुड्स पर 40% की नई दर थोपी गई है। लेकिन बड़ा सवाल यही है – क्या ये सुधार आम जनता को राहत देंगे, या सरकार की राजस्व-केंद्रित नीतियां फिर से मध्यम और निम्न वर्ग को दबाव में लाएंगी?
पहले का दौर: करों का जंगल, व्यापार पर बोझ
जीएसटी से पहले भारत की अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था जटिल और अराजक थी। वैट, एक्साइज, सर्विस टैक्स, एंट्री टैक्स और ऑक्ट्री जैसे कई कर अलग-अलग दरों पर लगते थे। अंतरराज्यीय व्यापार में चेक-पोस्ट की लंबी कतारें और 30% तक बढ़ी लॉजिस्टिक्स लागत व्यापारियों के लिए सिरदर्द थी। विश्व बैंक की 2017 की ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ रिपोर्ट में भारत 130वें पायदान पर था, जहां कर अनुपालन में औसतन 2,450 घंटे लगते थे। उस वक्त अप्रत्यक्ष करों से राजस्व 11 लाख करोड़ रुपये के आसपास था, जिसमें 20-25% कर चोरी की आशंका थी।
यह प्रणाली न सिर्फ व्यापारियों, बल्कि आम उपभोक्ताओं के लिए भी भारी थी। कैस्केडिंग इफेक्ट (टैक्स पर टैक्स) से सामान की कीमतें 15-20% तक बढ़ जाती थीं। ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को बीज-खाद पर 10-15% अतिरिक्त कर देना पड़ता, तो शहरी मध्यम वर्ग रोजमर्रा की चीजों पर अनिश्चित दरों से जूझता था। केंद्र और राज्य सरकारों के बीच राजस्व बंटवारे का झगड़ा भी आम था।
जीएसटी का आगमन: एकीकरण की राह, पर चुनौतियां कायम
1 जुलाई 2017 को जीएसटी लागू होने से कर प्रणाली में क्रांति आई। आईजीएसटी, सीजीएसटी और एसजीएसटी के जरिए कर अब उपभोग स्थल पर लगने लगा। इससे अंतरराज्यीय माल ढुलाई का समय 20% कम हुआ। ई-फाइलिंग ने अनुपालन को आसान किया, और कर रिटर्न दाखिल करने का समय घटकर 240 घंटे रह गया। 2020 तक भारत की ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ रैंकिंग 63 तक पहुंच गई।
आंकड़े सरकार की सफलता बयां करते हैं। वित्त वर्ष 2024-25 में जीएसटी संग्रह 22.08 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा, जो 2020-21 के 11.37 लाख करोड़ से दोगुना है। अगस्त 2025 में मासिक संग्रह 1.86 लाख करोड़ रुपये रहा, जो पिछले साल से 6.5% अधिक है। करदाता आधार 1.45 करोड़ तक फैला, और डिजिटल अनुपालन से कर चोरी 10-15% घटी। पीआईबी के अनुसार, जीएसटी ने ‘मेक इन इंडिया’ को बल देकर जीडीपी में 1.5-2% की वृद्धि की। लेकिन शुरुआती वर्षों में दिक्कतें भी कम नहीं थीं। छोटे व्यापारियों और एमएसएमई को डिजिटल फाइलिंग से 20-30% अतिरिक्त लागत झेलनी पड़ी। महंगाई में 2-3% की बढ़ोतरी हुई। इनपुट टैक्स क्रेडिट की कमी से निर्यातकों को 50,000 करोड़ का नुकसान हुआ। राज्य सरकारें मुआवजे पर निर्भर रहीं, और कानूनी ढांचे की कमजोरी ने विवाद बढ़ाए।
जीएसटी 2.0: राहत की किरण या नया बोझ?
‘जीएसटी 2.0’ सरकार की महत्वाकांक्षा का नया चेहरा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को वादा किया था कि दिवाली तक टैक्स दरें सरल होंगी। अब स्लैब 0%, 5%, 18% और 40% तक सीमित हैं। साबुन, टूथपेस्ट, ब्रेड जैसी जरूरी चीजों पर 5%, एसी, टीवी और सीमेंट पर 18% (पहले 28%), और तंबाकू-लग्जरी कारों पर 40% टैक्स है। स्वास्थ्य और जीवन बीमा पर 0% टैक्स से मध्यम वर्ग को राहत मिली है। क्लियरटैक्स के मुताबिक, 400 वस्तुओं पर दरें घटने से उपभोक्ता की क्रय शक्ति में 0.7-0.8% जीडीपी समकक्ष वृद्धि की उम्मीद है।
सरकार का दावा है कि ये सुधार खपत बढ़ाएंगे और अर्थव्यवस्था को गति देंगे। सिटी रिसर्च का अनुमान है कि महंगाई 1.1% कम होगी, और निर्यातकों के लिए रिफंड प्रक्रिया आसान होगी। जीएसटी नेटवर्क के डिजिटलीकरण से 90% रिफंड प्रावधानिक रूप से मिलेंगे। लेकिन 48,000 करोड़ रुपये की अनुमानित राजस्व हानि चिंता का विषय है, जिसे सरकार राजस्व वृद्धि से पूरा करने की उम्मीद रखती है।
जनता की चिंता: अनसुनी मजबूरी
फिर भी, आम आदमी की मुश्किलें कम नहीं दिखतीं। ग्रामीण भारत, जहां 70% आबादी बसती है, वहां डिजिटल अनुपालन अब भी चुनौती है। साग इन्फोटेक की रिपोर्ट के मुताबिक, 18-22% की दरें महंगाई बढ़ा सकती हैं, खासकर गरीबों के लिए बैंक खाते रखना महंगा पड़ सकता है। एमएसएमई, जो 11 करोड़ नौकरियां देता है, पर अनुपालन का बोझ 20% व्यवसायों को बंद कर सकता है। वैश्विक टैरिफ प्रभाव से बचाव का दावा है, लेकिन क्या यह वाकई विकास को गति देगा?
आगे की राह: संतुलन की जरूरत
जीएसटी ने भारत को वैश्विक मंच पर मजबूत किया, लेकिन इसकी सफलता तभी सार्थक होगी जब नीतियां जन-केंद्रित हों। 22 लाख करोड़ के संग्रह की चमक के पीछे छोटे व्यापारी की मुश्किलें छिपी हैं। सरकार को जीएसटी अपीलेट ट्रिब्यूनल (दिसंबर 2025 तक चालू) और पेट्रोल-शराब को जीएसटी दायरे में लाने जैसे कदम तेज करने होंगे। नहीं तो यह सुधार आंकड़ों की किताब तक सीमित रह जाएंगे। क्या ‘जीएसटी 2.0’ वाकई राहत का त्योहार बनेगा, या नई मजबूरियों का सबक? इसका जवाब समय देगा।
मध्य प्रदेश संवाददाता हरि शंकर पाराशर की कलम से…
(सभी आंकड़े जीएसटी काउंसिल, पीआईबी, क्लियरटैक्स और विश्व बैंक की रिपोर्ट्स पर आधारित।)
Author: Vikas Srivastava










