27000 विद्यालयों की बंदी गरीबों को शिक्षा से वंचित करने की साजिश: विजय विद्रोही
रायबरेली।

भाकपा (माले) राज्य स्थाई समिति सदस्य कॉमरेड विजय विद्रोही ने प्रदेश में 27000 सरकारी विद्यालयों की बंदी के सरकारी निर्णय को गरीबों को शिक्षा से वंचित करने की साजिश और उसके पूरी तरह व्यवसायीकरण की दिशा में बढ़ता एक कदम बताया।
सरकार के इस फैसले के विरुद्ध जन अभियान की शुरुआत करते हुए कुचरिया में एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि जिस भाजपा सरकार ने अपने लम्बे शासन काल में प्रदेश में एक स्कूल नहीं खोला, वह प्रदेश के हजारों स्कूल को बंद कर अशिक्षा का अंधेरा बढ़ाने की तरफ बढ़ रही है। कम बच्चों का बहाना बनाकर स्कूलों को खत्म करने के बजाय स्कूलों को पर्याप्त शिक्षकों की व्यवस्था देने, शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के बजाय बन्दी के जरिए निजी शिक्षा व्यवसाइयों को खुला मैदान दिया जा रहा है।
कामरेड विद्रोही ने कहा कि 2012-13 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2010 जिस दिन प्रभाव में आया उस समय 4 लाख शिक्षकों की उत्तर प्रदेश में जरूरत आंकी गई थी, किंतु उसके सापेक्ष 25% शिक्षकों की भर्ती की जा सकी। प्रदेश के 80% स्कूलों में बैठने के लिए कुर्सी मेज की व्यव्स्था नहीं की जा सकी। ड्रेस ,कॉपी किताब, मध्याह्न भोजन सिर्फ खानापूर्ति और भ्रष्ट्राचार का स्रोत बन गए। सरकार बच्चों की कमी की जिम्मेदारी खुद पर लेने के बजाय उसकी सजा गरीब गुरबों को देने जा रही है।
उन्होंने आगे कहा कि प्रदेश भर में दशकों से 2000 मासिक में सेवाएं दे रही 75 हजार से ज्यादा रसोईकर्मी बेकार हो जाएगी और प्रदेश में लाखों बीएड और बीटीसी शिक्षा प्राप्त युवकों का शिक्षक बनने का सपना भी इसी के साथ ध्वस्त हो जायेगा। सरकार अगर यह सोचती हो कि यह सब उसके लिए बहुत सरल है तो उसे इस गलतफहमी से बाहर आना चाहिए और अपने फैसले को वापस लेकर कमियों को दूर कर शिक्षकों की समुचित व्यवस्था, गुणवत्ता परक शिक्षा की व्यवस्था पर जोर देना चाहिए। अगर सरकार ने मनमाने ढंग से इस तुगलकी फरमान को लागू करने की कोशिश की तो उसे प्रदेश में मेहनतकश, बुद्धिजीवी, नौजवानों, छात्रों के बड़े आंदोलन का सामना करना पड़ेगा।
सभा में बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए और सभी ने विद्यालयों को बचाने के संघर्ष में हिस्सा लेने का संकल्प लिया। सभा में माले जिला सचिव उदय पटेल, किसान नेता रामचंद्र वर्मा, इंद्र बहादुर यादव, डाक्टर हलीम महमूद, गायत्री देवी, राजेश कुमार, गुलाम अहमद आदि ने भी अपने विचार रखे।









