ऑनलाइन सत्र “हमारे ज़माने की होली” में गूँजी फगुआ की मिठास
रायबरेली।

सामाजिक संस्था “मां- मेरा अपना आंगन” द्वारा आयोजित विशेष ऑनलाइन सत्र “हमारे ज़माने की होली” में देश के विभिन्न शहरों से जुड़े वरिष्ठजनों ने पारंपरिक होली की यादें साझा कीं। एक घंटे तक चले इस भावनात्मक और सांस्कृतिक कार्यक्रम में फगुआ गीत, प्राकृतिक रंगों की चर्चा और पुराने समय की होली की परंपराएँ मुख्य आकर्षण रहीं।
कार्यक्रम की शुरुआत होली के पारंपरिक महत्व और फागुन माह की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से हुई। वक्ताओं ने बताया कि पहले टेसू (पलाश) के फूलों से रंग बनाए जाते थे, जो त्वचा और पर्यावरण दोनों के लिए सुरक्षित होते थे। प्रतिभागियों ने यह भी साझा किया कि होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और अपनत्व का प्रतीक थी।
इस अवसर पर कार्यक्रम के पहले सत्र में लखनऊ से शशिधर द्विवेदी, वाराणसी से रामनारायण मिश्र, जयपुर से कमला शर्मा, भोपाल से राजेंद्र वर्मा, दिल्ली से उषा गुप्ता तथा देहरादून से हरिशंकर जोशी विशेष रूप से जुड़े। प्रतिभागियों ने अपने बचपन की होली के रोचक किस्से साझा करते हुए बताया कि 1980 और 1990 के दशक में 10 से 15 दिन की होली मनाई जाती थी, 10 दिनों तक लोग एक दूसरे के घर मिलने जाते थे, लेकिन ये सब अब खो गया है। उन्होंने बताया कि किस प्रकार पूरा मोहल्ला मिलकर होलिका दहन की तैयारी करता था होलिका के लिए लकड़ी इकठ्ठा की जाती थी और कई बार तो ज़रूरत से ज्यादा लकड़ी इकठ्ठा हो जाती थी। इस दौरान ढोलक और मंजीरे की थाप पर गाए जाने वाले फगुआ गीतों को याद किया गया। कई वरिष्ठजनों ने लाइव फगुआ की पंक्तियाँ भी गाकर सुनाईं, जिससे ऑनलाइन मंच पर भी पारंपरिक होली का वातावरण सजीव हो उठा।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में प्राकृतिक रंगों के महत्व पर भी जोर दिया गया और रासायनिक रंगों से होने वाले नुकसान के प्रति जागरूकता फैलाने की अपील की गई। रायबरेली से अशोक मिश्रा ने युवाओं से आग्रह किया कि वे पारंपरिक और पर्यावरण-अनुकूल तरीकों से होली मनाने की पहल करें। फरीदाबाद से अनीता टोपे ने कहा कि फेस्टिवल अब पार्टी का रूप ले चुके हैं, तो इस परिवेश को बदलने की ज़रूरत है। त्यौहारों को त्योहार ही रहने दें, ताकि हम आने वाली पीढ़ी को परंपरा और उत्सव की सौगात दे सकें।
कार्यक्रम के अंत में संस्था की ओर से सभी प्रतिभागियों को धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा गया कि इस प्रकार के सांस्कृतिक संवाद समाज में पीढ़ियों के बीच संवाद और जुड़ाव को मजबूत करते हैं। यह ऑनलाइन आयोजन न केवल वरिष्ठजनों के लिए स्मृतियों का उत्सव बना, बल्कि नई पीढ़ी के लिए भी परंपराओं से जुड़ने का एक सार्थक माध्यम साबित हुआ। मेरा अपना आँगन संस्था की अध्यक्षा प्रियंका पाण्डेय और सदस्य ऋषि सिन्हा ने इस ऑनलाइन होली सत्र थीम पर कार्यक्रम का संचालन किया।








